'फुलटॉस' में वेलकम

फुलटॉस की गली में आपका स्वागत है...यहां गुगली, बाउंसर, यॉर्कर के अलावा अपनी पसंद के बॉल फेंकने की खुली छूट है...इतना ही नहीं..यहां आउट होने के बाद भी पिच पर टिके रहने की इज़ाजत है... ख्याल बस इतना रहे कि बेशरम और बेरहम नहीं होना है... हां ये जरूर चाहूंगा कि पवेलियन जाने से पहले फिर से आने का वादा हो...

Wednesday, October 6, 2010

‘छेद’ और ‘लाल’ मतलब.... ?

.... अरे नहीं... जैसा आप सोच रहे हैं वैसा कुछ नहीं है... दरअसल.. मेरे गांव के सटा एक गांव है... जहां किस्सों-कहानियों जैसी एक ऐसी महिला है... जो गांव में काफी हिम्मती और समझदार समझी जाती हैं... लिहाजा स्थानीय महिलाएं उसे एक तरह से अपना लीडर मान बैठी हैं... गांवभर में इस महिला को सितिया के नाम से जाना जाता है... वैसे इसका नाम सीता है..छेद और लाल से जुड़ी रहस्यमय कहानी भी गांव की इसी तथाकथित गॉडमदर से जुड़ी है... सितिया जब शादी करके अपने ससुराल आईं... तो संस्कारों में बंधा पूरा गांव उनसे भी रीति-रिवाज और मर्यादों का पालन करने की मौन मांग कर रहा था.. वैसे सितिया को संस्कारों और मर्यादाओं के सालों पुराने होने के बावजूद मानने से इनकार नहीं था... लेकिन घूंघट के जमाने में विरोध की आवाज बुलंद करना... मतलब निजी जिंदगी तबाह करना होता... ससुराल आते ही सितिया नई नवेली दुल्हन की तरह नए रिश्ते-नातों के बीच अपनी निजी खुशी परम्पराओं की भेंट चढ़ाती रहीं... कुछ दिनों बाद जब वो अपने मायके आईं... उसे तो अपने शौहर से बात करने की बड़ी समस्या सामने आन पड़ी... सखी-सहेली भी शादी करके अपने-अपने घर बसा चुकी थीं... अब करे तो क्या करे... मोबाइल और इंटरनेट का जमाना तब यहां के लोगों की कल्पना के बाहर की चीज थी... लेकिन चिट्ठी भी लिखे तो कैसे... पोस्टकार्ड और लिफाफा किसी से मंगवाने का मतलब था... गांव भर को ये इत्तला देना कि सितिया अपने शौहर को चिट्ठी लिखने जा रही हैं.... आखिर जैसे तैसे मैनेज करके सितिया ने अपने शौहर को चिट्ठी लिख भेजा... लेकिन ये चिट्ठी उसके ससुराल में पोस्टमैन के लिए गले की फांस बन गई... क्योंकि उसपर जो पता लिखा था... वो तो सही था.. लेकिन अपने शौहर का नाम लिखने में परम्परा ने ऐसी टांग अड़ा दी थी... कि डाकिया बेचारा मारा मारा फिर रहा था... और किसी को कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा था कि आखिर वो इस समस्या का हल कैसे निकाले... गांव के नौजवानों के समझ के परे था... लेकिन एक दिन बेचारा डाकिया गांव के चौपाल के नजदीक से जब गुजर रहा था... तो गांव के बुजुर्गों ने पूछ लिया... कि भई तुम्हारे चेहरे पर किस बात की परेशानी दिख रही है... डाकिए ने जो समस्या बताई... उसपर बुजुर्गों को हंसे बिना नहीं रहा गया... उन्होंने तत्काल डाकिए की समस्या सुलझा दी... दरअसल... चिट्ठी पर सितिया ने अपने शौहर का नाम तो लिख रखा था... लेकिन ग्रामीण परम्पराओं और संस्कारों के तहत महिलाएं अपने पति का नाम जुबान पर नहीं लाती हैं... और न तो लिखती ही हैं... लिहाजा खत पर उन्होंने नाम लिखने की बजाय सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल किया... उस महिला ने लिफाफे के ऊपर नाम की जगह.... एक छेद बनाया... और उस छेद के चारों तरफ गोल आकार में लाल इंक से घेरा बना दिया... बस हो गया छेदीलाल.... लेकिन लिफाफे पर छेद और लाल की कूट भाषा में बना ये सांकेतिक छेदीलाल.... गांव वालों के साथ साथ डाकिए को भी पूरी नाच नचा दिया... इस तरह से सितिया की भेजी चिट्ठी छेदीलाल तक पहुंच गई.... लेकिन छेद और लाल का रहस्य समझने के बाद नए जमाने का बेचारा डाकिया भौंचक था... क्योंकि डाकिया तो कई बार छेदीलाल से भी इसबारे में पूछताछ कर चुका था... डाकिए को भौंचक देख... बुजुर्गों ने कहा... डाक बाबू ! ‘घूंघट’, ‘पल्लू’ और ‘ऐजी सुनिए न’........ इन सारे शब्दों के फेर में ही तो दुनिया चल रही है... नहीं तो ससुरी इस संसार में रखा क्या है.... एक जोरदार कोरस ठहाके के बीच चौपाल खत्म हो जाती है... डाकिया सिर खुजाता इस उधेड़बुन में अपने घर की तरफ चल पड़ता है... कि कहीं दूसरा छेदीलाल....! नहीं... नहीं... इतना ही काफी है....

नोट - सविनय निवेदन है कि मेरे न्यूअर और ओल्डर पोस्ट पर अपना महत्वपूर्ण कमेंट्स भेजकर मेरा उत्साहवर्धन करें... धन्यवाद...

2 comments:

Asha Joglekar said...

वाह भाई छेदी लाल खूब किया तोरे दुल्हनिया ने कमाल ।

Udan Tashtari said...

अभी तो न्यूअर पर ही कमेंट कर देते हैं..ओल्डर के लिए लौट कर आते हैं...छेदीलाल की करामात से फुर्सत पा लें पहले.