'फुलटॉस' में वेलकम

फुलटॉस की गली में आपका स्वागत है...यहां गुगली, बाउंसर, यॉर्कर के अलावा अपनी पसंद के बॉल फेंकने की खुली छूट है...इतना ही नहीं..यहां आउट होने के बाद भी पिच पर टिके रहने की इज़ाजत है... ख्याल बस इतना रहे कि बेशरम और बेरहम नहीं होना है... हां ये जरूर चाहूंगा कि पवेलियन जाने से पहले फिर से आने का वादा हो...

Sunday, October 17, 2010

ये नहीं सुधरेंगे...

कॉमनवेल्थ 2010 का रंगारंग क्लोजिंग सेरेमनी खत्म हो चुका था... जश्न में सभी मेहमान खिलाड़ियों ने जमकर मजे किए... दुनिया भर ने उमंग का वो लम्हा देखा और बगैर संकोच के भारत की तारीफ की... लेकिन सुबह होते होते एक खबर ने लोगों को चौंका दिया... हो सकता है कि कुछ लोगों ने नोटिस नहीं किया हो... लेकिन सबसे ज्यादा सभ्य होने का दावा करने वाले ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने खेलगांव में जो हरकतें की थी... वो हर संवेदनशील इंसान के लिए एक झटका था... क्योंकि जहां इन खिलाड़ियों ने पिछले 13 दिनों तक रहकर अपने देश के लिए सम्मान अर्जित किए... इज्जत कमाई और अपनी पहचान में चार चांद जड़े... उस जगह से इंसानियत के नाते भी एक लगाव होना चाहिए था... लेकिन कंगारुओं ने ये दिखा दिया कि वो सचमुच में कंगारुओं की खोल से अभी भी बाहर नहीं निकल पाए हैं... खेलगांव के उन कमरों को कंगारुओं ने इस तरह तहस-नहस कर दिया... जैसे फिल्म शूटिंग के लिए कोई फॉल्स सेट सजाया गया हो... और उसे हटाया जाना था.. इसलिए तोड़ दिया गया... कमरे की फर्नीचर, लाइटें, पलंग, शीशे... सभी तोड़ डाले गए... यहां तक कि आठवीं मंजिल के कमरे में रखे फ्रिज और वाशिंग मशीन को भी ऊपर से नीचे फेंक दिया गया... आखिर ऐसा क्यों... क्या कंगारुओं को गुस्सा आ गया था.. अगर ये सच मान भी लिया जाए... तो सवाल उठता है कि आखिर ये गुस्सा किसके ऊपर था... या फिर कुछ ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के बीच आपसी लड़ाई का नतीजा थी ये तोड़फोड़... लेकिन आयोजन समिति के बयान में कहा गया है कि खिलाड़ी मस्ती कर रहे थे... वहीं ऑस्ट्रेलिया ने कहा कि वो इसकी क्षतिपूर्ति कर देंगे... सबसे पहली बात तो ये कि क्या ऑस्ट्रेलियाई अपने मुल्क में भी ऐसे ही मस्ती करते हैं... कीमती सामानों को तोड़कर.. सवाल पूछा जा सकता है कि बेवजह लाखों का नुकसान पहुंचाकर ये कैसी मस्ती... और फिर इस हिंसक मस्ती से ऑस्ट्रेलियाई कैसे खुद को सबसे ज्यादा सभ्य होने का दावा कर सकते हैं... दूसरी बात ये कि जितना बेपर्दा ये कंगारू हैं... उससे ज्यादा बेहयाई तो इस बात में है कि ऑस्ट्रेलियाई उसकी कीमत लगा रहे हैं... यानी हम पैसे के भूखे हैं... जैसे इस पूरे मामले में हमने अपनी इज्जत नहीं... बल्कि पैसे देखे... ये तो मोहल्ले में दबंग बच्चों की लड़ाई जैसी बात हो गई... जिसे कहते हैं कि... एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी... दरअसल.. असली कहानी कुछ और ही है... ऑस्ट्रेलियाईयों को ये जरा भी गंवारा नहीं हुआ.. कि सचिन तेंदुलकर की वजह से वो टेस्ट सीरीज हार गये... सचिन से तो ये कंगारू खास बैर रखते हैं...क्योंकि क्रिकेट में उसे सर डॉन ब्रेडमैन से बढ़कर कोई मंजूर नहीं है... ब्रेडमैन से आगे वो देखना नहीं चाहते... जबकि सचिन को अब दुनिया क्रिकेट के देवता के तौर पर पूजने लगी है.. और सचिन ने सर डॉन ब्रेडमैन की सिर्फ जगह ही नहीं ली है ... बल्कि उससे कहीं आगे निकल चुके हैं... बताया जाता है कि कंगारु जब तोड़फोड़ कर रहे थे... तो तेंदुलकर के खिलाफ गालियां भी निकाल रहे थे... दूसरी बात ये कि मेलबर्न कॉमनवेल्थ में जो भारत चौथे नंबर पर था... वो चार साल में ही इतनी ऊंचाई कैसे पा ली... जिसके बदौलत न केवल मैनचेस्टर को भी पीछे छोड़ दिया बल्कि पदकों का सैकड़ा भी पार कर लिया... और सीधे ऑस्ट्रेलिया के ठीक पीछे जा खड़ा हुआ... ये बातें कंगारुओं को हजम नहीं हो रही हैं.. सुशील, सायना, गगन नारंग की अंतर्राष्ट्रीय तारीफ पर उसे तकलीफ होती है... उसे किसी और की श्रेष्ठता पसंद ही नहीं है... प्रतिस्पर्धा के नजरिए से ये बातें ठीक भी हो सकती हैं... लेकिन यहां तोड़फोड़ की जिस संस्कृति का कंगारुओं ने मुजाहिरा किया है वो प्रतिस्पर्धा से कोसों दूर है... इन्हें तोड़फोड़ करते हुए मेजबान की इज्जत और प्रतिष्ठा का जरा भी ख्याल नहीं आया... हाल के दिनों में भारत के खिलाफ कंगारुओं का खास गुस्सा देखा गया है... अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के अध्यक्ष पद से लेकर दिल्ली 2010 तक कंगारुओं के अभिमान पर भारत ने जो चोट किया है.. उससे ये ऑस्ट्रेलियाई तिलमिला उठे हैं... जादू-टोने और सांप-संपेरों का ये देश भला इतना आगे कैसे आ सकता है... ये सवाल तो कंगारुओं का अब तक सिर्फ पीछा कर रहा था.. लेकिन अब ऐसे सवाल हथौड़े बरसा रहे है... ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के साथ नस्ली भेदभाव भी खुलकर सामने आ गए हैं.. यहां तक की भारतीयों के खिलाफ नस्ली दुर्भावनाएं पालने में विक्टोरिया पुलिस ही सबसे आगे हैं... इसका खुलासा पुलिस के एक नस्ली ईमेल में हो चुका है... जिसमें भारतीयों को करंट से जलाकर निपटाने की बात कही गई थी... अब ये कंगारू खुद तय करे कि सभ्य कौन है.. वैसे भी दुनिया के सामने ये बड़बोले कंगारू बेनकाब हो चुके हैं.. अच्छा होगा कि मध्ययुगीन मानसिकता से ऑस्ट्रेलियाई जितना जल्दी बाहर आ जाएंगे...फायदे में रहेंगे... चमड़ियों के लिहाज से कंगारू अपने अंग्रेज भाईयों से इसकी सीख ले सकते हैं... उम्मीद है हवा का रुख पहचानेंगे ये कंगारु...

2 comments:

उस्ताद जी said...

2/10


अति साधारण पोस्ट
ऐसे नकारात्मक लेखन से बचिए
शुभ कामनाएं

Alpana Verma said...

yeh khabaren media ne nahin dikhaayee..isliye ye khabaren nayee lagin.