'फुलटॉस' में वेलकम

फुलटॉस की गली में आपका स्वागत है...यहां गुगली, बाउंसर, यॉर्कर के अलावा अपनी पसंद के बॉल फेंकने की खुली छूट है...इतना ही नहीं..यहां आउट होने के बाद भी पिच पर टिके रहने की इज़ाजत है... ख्याल बस इतना रहे कि बेशरम और बेरहम नहीं होना है... हां ये जरूर चाहूंगा कि पवेलियन जाने से पहले फिर से आने का वादा हो...

Wednesday, October 6, 2010

‘कछुआ नहीं खाए, कुत्ता तो खा लीजिए...’

हैरानी हो रही होगी आपको... मुझे भी हुई थी.. ऐसे लफ्ज पर लोग अक्सर अपना आपा खो सकते हैं... लेकिन यकीन जानिए.. इसकी सच्चाई जानने पर मैं शर्म से गड़ गया था... और फिर हंसी रुके नहीं रुकेगी... क्योंकि यूपी का बुंदेलखंड ऐसी ही अजीबो-गरीब कहानियों की लड़ी है... बात उस वक्त की है.. जब बुंदेलखंड के बीहड़ में दस्यु सरगना निर्भय गुर्जर का आतंक दम तोड़ने लगा था... और पुलिस से छिपने के लिए निर्भय के लिए बीहड़ भी कम पड़ गए थे... खबरिया चैनल के रिपोर्टर के नाते मुझे निर्भय गुर्जर का इंटरव्यू करना था... लेकिन निर्भय तक पहुंचने के लिए खुद को पहले ‘निर्भय’ बनाना वक्त की मांग थी... ऐसे में विश्वसनीय बिचौलिए की मदद लेनी पड़ी... निर्भय तक पहुंचना कोई खेल नहीं था... कानपुर से औरैया गया... फिर इटावा का रुख किया... मेरे बिचौलिये को दस्यु सरगना के लोगों से बात हो गई थी... निर्भय के ठिकानों का पीछा करते करते मुझे उस दौरान दो-चार गांवों में ठहरने का मौका मिला... ऐसे में अक्सर मैं झूठी कहानियां गढ़कर ग्राम प्रधान के यहां ठहर जाते थे... निर्भय गुर्जर से इंटरव्यू लेने से पहले जो रात मैंने बीहड़ के एक गांव में बिताई थी... वो रात हमेशा के लिए यादगार बन गई... ग्राम प्रधान का नाम दिलावर यादव था... 60 से ऊपर की उम्र थी उनकी... लेकिन अभी भी हट्टा-कट्ठा और लंबे-चौड़े कद काठी का दिलावर यादव बातचीत में काफी सरल थे... सेवा सत्कार में कोई कमी नहीं की... हम उनके लिए अतिथि थे.. कैमरा, गन माइक और ट्राईपॉड उनके हिसाब से हमारी टीम का प्रभाव बढ़ा रहा था... दूसरे दिन सुबह निर्भय गुर्जर से इंटरव्यू होना तय हो गया था... रात में जल्दी खाना खाकर सोना था... खाना खाने बैठा...तो दिलावर यादव खुद पूछ-पूछकर खिला रहे थे... इस इलाके में मुझे जगह जगह भाषाई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था... दिलावर यादव के यहां भी ठेठ बुंदेलखंडी मेरे सिर से ऊपर जा रही थी... खाने के दौरान दिलावर यादव ने मुझे और रोटियों के लिए पूछा.. मैं अपने साथ आए साथियों के सहारे इशारे से काम चला रहा था... पेट भर जाने पर दूसरी बार मैंने रोटियां लेने से मना कर दिया... लेकिन इसपर दिलावर यादव ने कहा... कछुओ ना खायो... कुतो खाए लो.... मैं अजीब उधेड़बुन में पड़ गया... मेरे चेहरे का रंग फक देख मेरे साथियों ने कहा... क्या हुआ... मैंने फौरन उससे कहा... दिलावर जी को क्या हो गया है... वो मुझे कह रहे हैं कि कछुआ नहीं खाए.. कुत्ता भी तो खा लीजिए.... इसपर मेरे साथी ने जोरदार ठहाका लगाया... फिर जल्दी ही मेरी गलतफहमी दूर कर दी... दरअसल... दिलावर यादव जी के कहने का आशय था... कि कुछ भी तो नहीं खाए... कुछ तो खा लीजिए... लेकिन मैंने समझ लिया... कि कछुआ नहीं खाए... कुत्ता भी तो खा लीजिए... फिर क्या था.. बीहड़ में भी मेहमान और मेजबान सभी एकसाथ हंस पड़े...
.... मुझे दस्यु सरगना निर्भय गुर्जर की सच्चाई, उसकी बगावत और उसके आतंक से बड़ी खबर मिल गई थी... ये खबर टीवी चैनल की नहीं... दिल के चैनल की थी... निर्भय मारा गया... लेकिन मेरी वो यादें जिंदा है...

नोट - इस पोस्ट के अलावा मेरा न्यूअर और ओल्डर पोस्ट पर भी अपने महत्वपूर्ण कमेंट्स देकर मेरा उत्साहवर्धन करें.... धन्यवाद...

1 comment:

vandana gupta said...

हा हा हा…………ऐसे वाकये ज़िन्दगी भर याद रह जाते हैं।