वैसे तो दिल्ली में काफी कुछ खास है... लेकिन यहां की भाषा और एनसीआर के सटे शहर, गांवों की बोलियां अपना दबदबा नहीं तो दखल जरूर रखती हैं... इनमें सबसे खास बोली है... ‘हरियाणे’ की ठेठ हरियाणवी... जो ताऊ की जुबान से जब निकलती है... तो जवाब लेकर ही चुप लगाती है... बिहार में जैसे पुलिस वालों की भाषाई पहचान भोजपुरी से जुड़ गई है... वैसे दिल्ली में बस ड्राइवरों की भाषाई पहचान हरियाणवी बोली से घुलमिल गई है... दूसरे प्रांतों से आने वाले लोगों को तो इन ड्राइवरों की बातें अक्सर पल्ले ही नहीं पड़ती हैं... लेकिन सुनने वालों को भरपूर मनोरंजन दे जाती है... एक दिन एक ताऊ को ऐसे ही एक बस ड्राइवर से पाला पड़ गया... ताऊ अपनी लुगाई के साथ दिल्ली से अपने शहर गोहाना जाने के लिए बस ढूंढ़ रहा था... गर्मी का मौसम था.. भरी दोपहरी में ताऊ बस पकड़ने के लिए परेशान था... सिर से हरियाणवी पगड़ी हटाकर उसपर पतले कपड़े वाली सफेद गांधी टोपी रख ली... सफेद टोपी, सफेद कुर्ता, सफेद धोती.. यानी ऊपर से नीचे तक ताऊ के बदन पर सफेद ही सफेद कपड़े थे... शायद हरियाणा के ताऊ की परम्परागत पहचान भी यही होती है... खैर.... दोपहरी में पेड़ की छांव के पास खड़ी एक बस ड्राइवर को ताऊ ने आवाज लगाई... अरे छोरे... यो गड्डी कित्थे जाग्गी ? जवाब नहीं मिलने पर फिर से जोर की आवाज लगाई... लेकिन जवाब फिर नहीं मिला... अब ड्राइवर को नींद से जगाकर पूछा... हां ‘पई’.. तेरे से ही पुच्छूं... यो गड्डी कित्थे जाग्गी ? नींद टूटने से खफा ड्राइवर ने गुस्से में कहा... लंदन जाग्गी...जाग्गा का... बेचारा सीधा साधा ताऊ... ड्राइवर के गुस्से को भांप नहीं पाया... फिर तपाक से बोल बैठा... फट्टे (बस के फ्रंट पर) पे तो सोन्निपत लिक्खा है... ड्राइवर भी छूटते ही कहा.. तू फट्टे पे जाग्गा या गड्डी पे... मुझे दोनों के बीच ठेठ हरियाणवी हो रही इस बातचीत पर जोरदार हंसी आई... खैर... ताऊ को आखिरकार जवाब नहीं मिला... ताऊ तो चले गए... लेकिन हरियाणा की भाषा मेरे ऊपर अपना असर दिखा गई... मैं दोनों के अक्खड़पन में भाषाई सुंदरता और हंसी टटोलकर काफी रोमांचित हो रहा था... ताऊ और ड्राइवर के इस वाकयुद्ध में उम्र का तनाव नहीं था.. बल्कि मिट्टी की खुशबू महसूस कर रहा था... सच में अपनी जमीन से जुड़ी भाषा में लड़ाई का भी अपना एक मतलब होता है... एक रंगबाजी होती है... ताऊ अपने थे... तो छोरा भी अपना था... नींद अपनी थी.. तो गुस्सा भी अपना-सा था... अगर नहीं था... तो मन में मैल नहीं था... जुबान चल रही थी... लेकिन धारदार कटुता नहीं थी... ये बात दोनों ने गौर नहीं की... लेकिन सुनने वालों ने नोटिस किया... मैं खुश था... क्योंकि मुझे जीवन की एक सच्चाई मिल गई थी...
.... थोड़ी देर बाद ताऊ को गड्डी मिल गई... लंदन की नहीं... गोहाना की ही मिली... गड्डी के पीछे लिखा था... लटक मत पटक दूंगी... गाड़ी हरियाणा की थी... हा हा हा.....
नोट - इस पोस्ट के अलावा मेरा न्यूअर और ओल्डर पोस्ट पर भी अपने महत्वपूर्ण कमेंट्स देकर मेरा उत्साहवर्धन करें.... धन्यवाद...
'फुलटॉस' में वेलकम
फुलटॉस की गली में आपका स्वागत है...यहां गुगली, बाउंसर, यॉर्कर के अलावा अपनी पसंद के बॉल फेंकने की खुली छूट है...इतना ही नहीं..यहां आउट होने के बाद भी पिच पर टिके रहने की इज़ाजत है... ख्याल बस इतना रहे कि बेशरम और बेरहम नहीं होना है... हां ये जरूर चाहूंगा कि पवेलियन जाने से पहले फिर से आने का वादा हो...
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