'फुलटॉस' में वेलकम

फुलटॉस की गली में आपका स्वागत है...यहां गुगली, बाउंसर, यॉर्कर के अलावा अपनी पसंद के बॉल फेंकने की खुली छूट है...इतना ही नहीं..यहां आउट होने के बाद भी पिच पर टिके रहने की इज़ाजत है... ख्याल बस इतना रहे कि बेशरम और बेरहम नहीं होना है... हां ये जरूर चाहूंगा कि पवेलियन जाने से पहले फिर से आने का वादा हो...

Tuesday, October 12, 2010

‘दस्यु सुंदरी’ को धिक्कार है...

फिल्म शोले में डाकू गब्बर सिंह का एक मशहूर डायलॉग है... आदमी तीन और गोलियां छह... बहुत नाइंसाफी है... अगर कॉमनवेल्थ में सोना जीतने वाली एक बेहद ही गरीब भारतीय महिला निशानेबाज का जिक्र करें... और शूटिंग के लिए उसकी दीवानगी पर गौर करें... तो ममता दीदी पर डाकू गब्बर सिंह का उपर्युक्त डायलॉग पूरी तरह फिट बैठता है... इस लिहाज से ममता दीदी को रेल मंत्रालय की दस्यु सुंदरी कहा जाए तो गलत नहीं होगा... कहीं ऐसा तो नहीं कि... निशानेबाज पश्चिम बंगाल की रहने वाली नहीं थीं... इसलिए उनकी क्षमता पर ममता दीदी... शॉरी बैंडिट क्वीन ऑफ रेलवे मिनिस्ट्री को शक था... और इसलिए उसे सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं दी गई... दूसरे नजरिए से भी देखें.. तो एक महिला ने दूसरी महिला के साथ जो बर्ताव किया है... वो केवल नाइंसाफी ही नहीं... बल्कि अमानवीयता की हद है.... खैर... सच जो भी हो.. लेकिन जनतंत्र की चौखट पर नियमों का मनमाफिक हवाला देकर हिटलरशाही चलाने वाली रेलमंत्री इस मामले में पूरी तरह से कसूरवार हैं... वो तो उस महिला निशानेबाज ने अपने हौसलों की उड़ान से जो कारनामे दिखाई हैं... पूरी दुनिया उसके प्रति नतमस्तक हैं... खेल को बढ़ावा देने का दम भरने वाले रेल मंत्रालय ने न केवल उस महिला निशानेबाज को 15 महीने का वेतन नहीं दिया... बल्कि नौकरी छोड़ने को भी मजबूर किया... मैं डाकू गब्बर सिंह तो नहीं हूं.. लेकिन अगर आज गब्बर सिंह भी जिंदा होते... तो कालिया की जगह ममता दीदी खड़ी होंती... और सारे डायलॉग बोलने के बाद आखिर में कहना नहीं भूलते... धिक्कार है....