'फुलटॉस' में वेलकम
Sunday, October 17, 2010
ये नहीं सुधरेंगे...
Wednesday, October 13, 2010
एंकर बदनाम हुईं.....
........ इस बीच बॉस समेत सभी ब्रेकिंग वीर पत्रकारों की नजरें टीवी स्क्रिन पर टिकी थीं... लेकिन संवाददाता हरिकेश की ठंडी आवाज के साथ खबर सुनते ही न्यूजरुम में सन्नाटा छा गया... सभी को जैसे सांप सूंघ गया हो... संवाददाता हरिकेश ने कहा... श्रद्धा (एंकर) जी मैं सबसे पहले आपको बताना चाहूंगा... कि ये बम बनाने की नहीं... बल्कि बाम बनाने की फैक्ट्री है... जहां चोरी-छुपे देसी ब्रांडेड बाम बनाए जाते थे...
अब किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था.. कि क्या करे... पीसीआर परेशान.. एंकर हैरान.. और बॉस की आंखें लाल-पीली हो रही थीं... फिर देखते ही देखते बॉस की कानफाड़ू तेज आवाज आई... ड्रॉप ब्रेकिंग इमेडिएटली... टेक ए ब्रेक... प्रतिस्पर्धा की दौर में क्षेत्रिय चैनल में... वो भी प्राइम टाइम में इस तरह की गलती बॉस को काफी नागवार गुजरा... खबर फ्लैश करने वाला एसाइनमेंट का एक बंदा रात में ही नप गया... इस पूरे वाकये में एंकर बदनाम हो चुकी थीं... लेकिन दबंग फिल्म का इतना असर था कर्मचारियों पर... कि फौरन पैरॉडी बना ली गई... एंकर बदनाम हुईं... देसी बाम तेरे लिए... धन्यवाद...
Tuesday, October 12, 2010
‘दस्यु सुंदरी’ को धिक्कार है...
Monday, October 11, 2010
नो मोर प्लीज...
दिल्ली में बस कंडक्टरों के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वो बड़ा हाजिर जवाब होतें हैं... और अंग्रेजी के दो-चार शब्दों के बार-बार इस्तेमाल से मुसाफिरों को चकित कर देते हैं... स्टॉप पर बस के रुकते ही कंडक्टर यात्रियों को जगह का नाम लेते हुए पुकारते हैं... लेकिन बस में जगह नहीं रहने पर नो मोर प्लीज... नोर मोर प्लीज.. का रटा रटाया जुमला फेंकते हुए अपना असर दिखाने की कोशिश करते हैं... उसके बाद फिर से हवा में अंग्रेजी का एक जुमला फेंकते हैं... ‘टिकिट’ प्लीज… लेकिन खुद को शेर समझने वाले ऐसे बस कंडक्टर्स को कभी कभी दिल्ली के हाजिर जवाब बाशिंदे खड़े खड़े चित कर देते हैं... ऐसे ही एक मौके पर डीटीसी बस के एक कंडक्टर ने बस स्टॉप पर भीड़ को देखते हुए... पहले तो मुसाफिरों की तरफ मुखातिब हुए... और फिर अंग्रेजी का वही तोता रटंत जुमला फेंका... लेडीज फर्स्ट प्लीज... मुसाफिरों ने जुमले को फॉलो किया.. बस स्टॉप पर खड़ीं सभी महिलाएं चढ़ गईं... लेकिन जब मर्दों की बारी आई.. तो संयोगवश कंडक्टर ने फिर से जुमला फेंक दिया.. और कहा...नो मोर प्लीज...नो मोर प्लीज...छूटते ही काफी देर से बस का इंतजार कर रहे एक बुजुर्ग ने जवाबी जुमला फेक दिया... अरे ओ बस कंडक्टर... तूने सारी मोरनी तो चढ़ा ली... मोर की बारी आई तो नो मोर प्लीज...इस बार बुजुर्ग की इस गुगली पर कंडक्टर क्लीन बोल्ड हो गया था... लेकिन बस के अंदर और स्टॉप पर खड़े मुसाफिरों को हंसी का टॉनिक मिल गया... माहौल में फैला तनाव गायब हो चुका था.. स्टॉप पर खड़े बाकी के मुसाफिर.... शॉरी मोर और मोरनी... दूसरी बस का इंतजार करने लगे... धन्यवाद...
Wednesday, October 6, 2010
‘छेद’ और ‘लाल’ मतलब.... ?
नोट - सविनय निवेदन है कि मेरे न्यूअर और ओल्डर पोस्ट पर अपना महत्वपूर्ण कमेंट्स भेजकर मेरा उत्साहवर्धन करें... धन्यवाद...
समोसे वाला ब्लू लाइन
मैं और राजीव भी एक दिन आईटीओ में ब्लू लाइऩ पर सवार होने के लिए.... छात्रों के बीच मशहूर हो चुके ऐसी ही टेक्निक का इस्तेमाल किया.... आईटीओ के बस स्टॉप से आगे जाकर रेड लाइट से पहले हम दोनों खड़े हो गए... उम्मीद के मुताबिक हाथ देते ही ब्लू लाइन बस रुक गई.... दिक्कत की बात ये थी कि बस में इक्के-दुक्के सवारी ही मौजूद थे... और कंडक्टर हर किसी से पैसे लेने के मूड में था... ऐसे में कंडक्टर बड़ी आस से टिकट निकालते हुए कहा कि हां भई कहां का टिकट दूं... मेरे दोस्त ने छूटते ही कहा... पास.... कुढ़ा-चिढ़ा कंडक्टर भी तपाक से बोल पड़ा... समोसे लाऊं सर... गरमागरम चाय के साथ... आस पास बैठी सवारियां कंडक्टर के इस जुमले पर जोर से हंस पड़े... हंसी तो हम दोनों को भी काफी आ रही थी... लेकिन कंडक्टर की इस अनचाही और अनायास प्रतिक्रिया पर हम दोनों हैरान और अवाक थे... लेकिन हम ठहरे छात्र... वो भी बिहार से आए किसी ऐरे-गैरे गांव के... सवारियां चढ़ती-उतरती रहीं... हम अपने गंतव्य तक पहुंचने का इंतजार करते रहे.... इस बीच कनखियों में कंडक्टर हमें... और हम कंडक्टर को देखते रहे... घूरते रहे... वैसे टक्कर तो नहीं हुई... लेकिन टक्कर की आशंका दोनों तरफ से थी... उसे छात्र ग्रंथि का डर था॥ तो हमें बिगडैल जाट का भय... लक्ष्मीनगर बस स्टॉप आते ही हम दोनों विनम्र छात्र से कब शेर दिल छात्र में बदल गए... पता ही नहीं चला... कंडक्टर भी लड़कियों की तरह आंखों की भाषा समझने में माहिर था... चुप रहना ही ठीक समझा... लेकिन जाते जाते मेरे दोस्त ने जबावी जुमला ठोक ही दिया... हां भई कंडक्टर... तेरे ऑफर का क्या हुआ... समोसे और चाय नहीं लाए... वैसे बता दूं॥ मैं कॉपी पीता हूं... और यहां ज्यादा बोले... तो तेरा खून भी पीऊंगा... मुझे ये समझते देर नहीं लगी... कि वाकई हम शेर(जानवर) बन गए थे... दिल से ही नहीं... व्यवहार से भी... क्योंकि ये सारा माजरा सिर्फ तीन रुपए के टिकट से शुरू हुआ था... कानूनी तौर पर हम गलत नहीं थे... तो पापी पेट के लिए वो भी गलत नहीं था... समझदारी आने में कभी कभी काफी लंबा वक्त लग जाता है... शायद देर आए दुरुस्त आए... चलता हूं...
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‘कछुआ नहीं खाए, कुत्ता तो खा लीजिए...’
.... मुझे दस्यु सरगना निर्भय गुर्जर की सच्चाई, उसकी बगावत और उसके आतंक से बड़ी खबर मिल गई थी... ये खबर टीवी चैनल की नहीं... दिल के चैनल की थी... निर्भय मारा गया... लेकिन मेरी वो यादें जिंदा है...
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यो गड्डी कित्थे जाग्गी... ?
.... थोड़ी देर बाद ताऊ को गड्डी मिल गई... लंदन की नहीं... गोहाना की ही मिली... गड्डी के पीछे लिखा था... लटक मत पटक दूंगी... गाड़ी हरियाणा की थी... हा हा हा.....
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