'फुलटॉस' में वेलकम

फुलटॉस की गली में आपका स्वागत है...यहां गुगली, बाउंसर, यॉर्कर के अलावा अपनी पसंद के बॉल फेंकने की खुली छूट है...इतना ही नहीं..यहां आउट होने के बाद भी पिच पर टिके रहने की इज़ाजत है... ख्याल बस इतना रहे कि बेशरम और बेरहम नहीं होना है... हां ये जरूर चाहूंगा कि पवेलियन जाने से पहले फिर से आने का वादा हो...

Sunday, October 17, 2010

ये नहीं सुधरेंगे...

कॉमनवेल्थ 2010 का रंगारंग क्लोजिंग सेरेमनी खत्म हो चुका था... जश्न में सभी मेहमान खिलाड़ियों ने जमकर मजे किए... दुनिया भर ने उमंग का वो लम्हा देखा और बगैर संकोच के भारत की तारीफ की... लेकिन सुबह होते होते एक खबर ने लोगों को चौंका दिया... हो सकता है कि कुछ लोगों ने नोटिस नहीं किया हो... लेकिन सबसे ज्यादा सभ्य होने का दावा करने वाले ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने खेलगांव में जो हरकतें की थी... वो हर संवेदनशील इंसान के लिए एक झटका था... क्योंकि जहां इन खिलाड़ियों ने पिछले 13 दिनों तक रहकर अपने देश के लिए सम्मान अर्जित किए... इज्जत कमाई और अपनी पहचान में चार चांद जड़े... उस जगह से इंसानियत के नाते भी एक लगाव होना चाहिए था... लेकिन कंगारुओं ने ये दिखा दिया कि वो सचमुच में कंगारुओं की खोल से अभी भी बाहर नहीं निकल पाए हैं... खेलगांव के उन कमरों को कंगारुओं ने इस तरह तहस-नहस कर दिया... जैसे फिल्म शूटिंग के लिए कोई फॉल्स सेट सजाया गया हो... और उसे हटाया जाना था.. इसलिए तोड़ दिया गया... कमरे की फर्नीचर, लाइटें, पलंग, शीशे... सभी तोड़ डाले गए... यहां तक कि आठवीं मंजिल के कमरे में रखे फ्रिज और वाशिंग मशीन को भी ऊपर से नीचे फेंक दिया गया... आखिर ऐसा क्यों... क्या कंगारुओं को गुस्सा आ गया था.. अगर ये सच मान भी लिया जाए... तो सवाल उठता है कि आखिर ये गुस्सा किसके ऊपर था... या फिर कुछ ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के बीच आपसी लड़ाई का नतीजा थी ये तोड़फोड़... लेकिन आयोजन समिति के बयान में कहा गया है कि खिलाड़ी मस्ती कर रहे थे... वहीं ऑस्ट्रेलिया ने कहा कि वो इसकी क्षतिपूर्ति कर देंगे... सबसे पहली बात तो ये कि क्या ऑस्ट्रेलियाई अपने मुल्क में भी ऐसे ही मस्ती करते हैं... कीमती सामानों को तोड़कर.. सवाल पूछा जा सकता है कि बेवजह लाखों का नुकसान पहुंचाकर ये कैसी मस्ती... और फिर इस हिंसक मस्ती से ऑस्ट्रेलियाई कैसे खुद को सबसे ज्यादा सभ्य होने का दावा कर सकते हैं... दूसरी बात ये कि जितना बेपर्दा ये कंगारू हैं... उससे ज्यादा बेहयाई तो इस बात में है कि ऑस्ट्रेलियाई उसकी कीमत लगा रहे हैं... यानी हम पैसे के भूखे हैं... जैसे इस पूरे मामले में हमने अपनी इज्जत नहीं... बल्कि पैसे देखे... ये तो मोहल्ले में दबंग बच्चों की लड़ाई जैसी बात हो गई... जिसे कहते हैं कि... एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी... दरअसल.. असली कहानी कुछ और ही है... ऑस्ट्रेलियाईयों को ये जरा भी गंवारा नहीं हुआ.. कि सचिन तेंदुलकर की वजह से वो टेस्ट सीरीज हार गये... सचिन से तो ये कंगारू खास बैर रखते हैं...क्योंकि क्रिकेट में उसे सर डॉन ब्रेडमैन से बढ़कर कोई मंजूर नहीं है... ब्रेडमैन से आगे वो देखना नहीं चाहते... जबकि सचिन को अब दुनिया क्रिकेट के देवता के तौर पर पूजने लगी है.. और सचिन ने सर डॉन ब्रेडमैन की सिर्फ जगह ही नहीं ली है ... बल्कि उससे कहीं आगे निकल चुके हैं... बताया जाता है कि कंगारु जब तोड़फोड़ कर रहे थे... तो तेंदुलकर के खिलाफ गालियां भी निकाल रहे थे... दूसरी बात ये कि मेलबर्न कॉमनवेल्थ में जो भारत चौथे नंबर पर था... वो चार साल में ही इतनी ऊंचाई कैसे पा ली... जिसके बदौलत न केवल मैनचेस्टर को भी पीछे छोड़ दिया बल्कि पदकों का सैकड़ा भी पार कर लिया... और सीधे ऑस्ट्रेलिया के ठीक पीछे जा खड़ा हुआ... ये बातें कंगारुओं को हजम नहीं हो रही हैं.. सुशील, सायना, गगन नारंग की अंतर्राष्ट्रीय तारीफ पर उसे तकलीफ होती है... उसे किसी और की श्रेष्ठता पसंद ही नहीं है... प्रतिस्पर्धा के नजरिए से ये बातें ठीक भी हो सकती हैं... लेकिन यहां तोड़फोड़ की जिस संस्कृति का कंगारुओं ने मुजाहिरा किया है वो प्रतिस्पर्धा से कोसों दूर है... इन्हें तोड़फोड़ करते हुए मेजबान की इज्जत और प्रतिष्ठा का जरा भी ख्याल नहीं आया... हाल के दिनों में भारत के खिलाफ कंगारुओं का खास गुस्सा देखा गया है... अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के अध्यक्ष पद से लेकर दिल्ली 2010 तक कंगारुओं के अभिमान पर भारत ने जो चोट किया है.. उससे ये ऑस्ट्रेलियाई तिलमिला उठे हैं... जादू-टोने और सांप-संपेरों का ये देश भला इतना आगे कैसे आ सकता है... ये सवाल तो कंगारुओं का अब तक सिर्फ पीछा कर रहा था.. लेकिन अब ऐसे सवाल हथौड़े बरसा रहे है... ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के साथ नस्ली भेदभाव भी खुलकर सामने आ गए हैं.. यहां तक की भारतीयों के खिलाफ नस्ली दुर्भावनाएं पालने में विक्टोरिया पुलिस ही सबसे आगे हैं... इसका खुलासा पुलिस के एक नस्ली ईमेल में हो चुका है... जिसमें भारतीयों को करंट से जलाकर निपटाने की बात कही गई थी... अब ये कंगारू खुद तय करे कि सभ्य कौन है.. वैसे भी दुनिया के सामने ये बड़बोले कंगारू बेनकाब हो चुके हैं.. अच्छा होगा कि मध्ययुगीन मानसिकता से ऑस्ट्रेलियाई जितना जल्दी बाहर आ जाएंगे...फायदे में रहेंगे... चमड़ियों के लिहाज से कंगारू अपने अंग्रेज भाईयों से इसकी सीख ले सकते हैं... उम्मीद है हवा का रुख पहचानेंगे ये कंगारु...

Wednesday, October 13, 2010

एंकर बदनाम हुईं.....

पीसीआर अलर्ट... ब्रेकिंग न्यूज फ्रॉम रायपुर... इनफॉर्म स्टूडियो एंकर... एंड टेक दिस ब्रेकिंग विदाउट एनी डिले... रनडाउन से टॉक बैक पर बॉस की तरफ से आए इस अलर्ट को सुनते ही पीसीआर हरकत में आया... ओके बोलते ही कुछ सेकेंड बाद ब्रकिंग न्यूज की फुल स्क्रिन ग्राफिक्स टेक्स्ट टीवी पर धड़ाधड़ चलने लगा... साथ ही एंकर की आवाज... इस वक्त रायपुर से एक बड़ी खबर आ रही है... जहां बम बनाने की फ्रैक्ट्री पकड़ी गई है... पुलिस छापे में कई अपराधी भी गिरफ्तार किए गए हैं... और बड़ी तादाद में बम और बारुद बरामद हुए हैं... ज्यादा जानकारी के लिए आपको सीधे लिए चलते हैं रायपुर... जहां हमारे संवाददाता हरिकेश मौके पर मौजूद हैं..... हां हरिकेश... क्या आपको मेरी आवाज आ रही है... हां हां... श्रद्धा जी आपकी आवाज आ रही है.... बताइए क्या अपडेट है आपके पास और बम बनाने की ये फैक्ट्री किस इलाके में पकड़ी गई है...
........ इस बीच बॉस समेत सभी ब्रेकिंग वीर पत्रकारों की नजरें टीवी स्क्रिन पर टिकी थीं... लेकिन संवाददाता हरिकेश की ठंडी आवाज के साथ खबर सुनते ही न्यूजरुम में सन्नाटा छा गया... सभी को जैसे सांप सूंघ गया हो... संवाददाता हरिकेश ने कहा... श्रद्धा (एंकर) जी मैं सबसे पहले आपको बताना चाहूंगा... कि ये बम बनाने की नहीं... बल्कि बाम बनाने की फैक्ट्री है... जहां चोरी-छुपे देसी ब्रांडेड बाम बनाए जाते थे...
अब किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था.. कि क्या करे... पीसीआर परेशान.. एंकर हैरान.. और बॉस की आंखें लाल-पीली हो रही थीं... फिर देखते ही देखते बॉस की कानफाड़ू तेज आवाज आई... ड्रॉप ब्रेकिंग इमेडिएटली... टेक ए ब्रेक... प्रतिस्पर्धा की दौर में क्षेत्रिय चैनल में... वो भी प्राइम टाइम में इस तरह की गलती बॉस को काफी नागवार गुजरा... खबर फ्लैश करने वाला एसाइनमेंट का एक बंदा रात में ही नप गया... इस पूरे वाकये में एंकर बदनाम हो चुकी थीं... लेकिन दबंग फिल्म का इतना असर था कर्मचारियों पर... कि फौरन पैरॉडी बना ली गई... एंकर बदनाम हुईं... देसी बाम तेरे लिए... धन्यवाद...

Tuesday, October 12, 2010

‘दस्यु सुंदरी’ को धिक्कार है...

फिल्म शोले में डाकू गब्बर सिंह का एक मशहूर डायलॉग है... आदमी तीन और गोलियां छह... बहुत नाइंसाफी है... अगर कॉमनवेल्थ में सोना जीतने वाली एक बेहद ही गरीब भारतीय महिला निशानेबाज का जिक्र करें... और शूटिंग के लिए उसकी दीवानगी पर गौर करें... तो ममता दीदी पर डाकू गब्बर सिंह का उपर्युक्त डायलॉग पूरी तरह फिट बैठता है... इस लिहाज से ममता दीदी को रेल मंत्रालय की दस्यु सुंदरी कहा जाए तो गलत नहीं होगा... कहीं ऐसा तो नहीं कि... निशानेबाज पश्चिम बंगाल की रहने वाली नहीं थीं... इसलिए उनकी क्षमता पर ममता दीदी... शॉरी बैंडिट क्वीन ऑफ रेलवे मिनिस्ट्री को शक था... और इसलिए उसे सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं दी गई... दूसरे नजरिए से भी देखें.. तो एक महिला ने दूसरी महिला के साथ जो बर्ताव किया है... वो केवल नाइंसाफी ही नहीं... बल्कि अमानवीयता की हद है.... खैर... सच जो भी हो.. लेकिन जनतंत्र की चौखट पर नियमों का मनमाफिक हवाला देकर हिटलरशाही चलाने वाली रेलमंत्री इस मामले में पूरी तरह से कसूरवार हैं... वो तो उस महिला निशानेबाज ने अपने हौसलों की उड़ान से जो कारनामे दिखाई हैं... पूरी दुनिया उसके प्रति नतमस्तक हैं... खेल को बढ़ावा देने का दम भरने वाले रेल मंत्रालय ने न केवल उस महिला निशानेबाज को 15 महीने का वेतन नहीं दिया... बल्कि नौकरी छोड़ने को भी मजबूर किया... मैं डाकू गब्बर सिंह तो नहीं हूं.. लेकिन अगर आज गब्बर सिंह भी जिंदा होते... तो कालिया की जगह ममता दीदी खड़ी होंती... और सारे डायलॉग बोलने के बाद आखिर में कहना नहीं भूलते... धिक्कार है....

Monday, October 11, 2010

नो मोर प्लीज...

दिल्ली में बस कंडक्टरों के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वो बड़ा हाजिर जवाब होतें हैं... और अंग्रेजी के दो-चार शब्दों के बार-बार इस्तेमाल से मुसाफिरों को चकित कर देते हैं... स्टॉप पर बस के रुकते ही कंडक्टर यात्रियों को जगह का नाम लेते हुए पुकारते हैं... लेकिन बस में जगह नहीं रहने पर नो मोर प्लीज... नोर मोर प्लीज.. का रटा रटाया जुमला फेंकते हुए अपना असर दिखाने की कोशिश करते हैं... उसके बाद फिर से हवा में अंग्रेजी का एक जुमला फेंकते हैं... टिकिट प्लीज लेकिन खुद को शेर समझने वाले ऐसे बस कंडक्टर्स को कभी कभी दिल्ली के हाजिर जवाब बाशिंदे खड़े खड़े चित कर देते हैं... ऐसे ही एक मौके पर डीटीसी बस के एक कंडक्टर ने बस स्टॉप पर भीड़ को देखते हुए... पहले तो मुसाफिरों की तरफ मुखातिब हुए... और फिर अंग्रेजी का वही तोता रटंत जुमला फेंका... लेडीज फर्स्ट प्लीज... मुसाफिरों ने जुमले को फॉलो किया.. बस स्टॉप पर खड़ीं सभी महिलाएं चढ़ गईं... लेकिन जब मर्दों की बारी आई.. तो संयोगवश कंडक्टर ने फिर से जुमला फेंक दिया.. और कहा...नो मोर प्लीज...नो मोर प्लीज...छूटते ही काफी देर से बस का इंतजार कर रहे एक बुजुर्ग ने जवाबी जुमला फेक दिया... अरे ओ बस कंडक्टर... तूने सारी मोरनी तो चढ़ा ली... मोर की बारी आई तो नो मोर प्लीज...इस बार बुजुर्ग की इस गुगली पर कंडक्टर क्लीन बोल्ड हो गया था... लेकिन बस के अंदर और स्टॉप पर खड़े मुसाफिरों को हंसी का टॉनिक मिल गया... माहौल में फैला तनाव गायब हो चुका था.. स्टॉप पर खड़े बाकी के मुसाफिर.... शॉरी मोर और मोरनी... दूसरी बस का इंतजार करने लगे... धन्यवाद...

Wednesday, October 6, 2010

‘छेद’ और ‘लाल’ मतलब.... ?

.... अरे नहीं... जैसा आप सोच रहे हैं वैसा कुछ नहीं है... दरअसल.. मेरे गांव के सटा एक गांव है... जहां किस्सों-कहानियों जैसी एक ऐसी महिला है... जो गांव में काफी हिम्मती और समझदार समझी जाती हैं... लिहाजा स्थानीय महिलाएं उसे एक तरह से अपना लीडर मान बैठी हैं... गांवभर में इस महिला को सितिया के नाम से जाना जाता है... वैसे इसका नाम सीता है..छेद और लाल से जुड़ी रहस्यमय कहानी भी गांव की इसी तथाकथित गॉडमदर से जुड़ी है... सितिया जब शादी करके अपने ससुराल आईं... तो संस्कारों में बंधा पूरा गांव उनसे भी रीति-रिवाज और मर्यादों का पालन करने की मौन मांग कर रहा था.. वैसे सितिया को संस्कारों और मर्यादाओं के सालों पुराने होने के बावजूद मानने से इनकार नहीं था... लेकिन घूंघट के जमाने में विरोध की आवाज बुलंद करना... मतलब निजी जिंदगी तबाह करना होता... ससुराल आते ही सितिया नई नवेली दुल्हन की तरह नए रिश्ते-नातों के बीच अपनी निजी खुशी परम्पराओं की भेंट चढ़ाती रहीं... कुछ दिनों बाद जब वो अपने मायके आईं... उसे तो अपने शौहर से बात करने की बड़ी समस्या सामने आन पड़ी... सखी-सहेली भी शादी करके अपने-अपने घर बसा चुकी थीं... अब करे तो क्या करे... मोबाइल और इंटरनेट का जमाना तब यहां के लोगों की कल्पना के बाहर की चीज थी... लेकिन चिट्ठी भी लिखे तो कैसे... पोस्टकार्ड और लिफाफा किसी से मंगवाने का मतलब था... गांव भर को ये इत्तला देना कि सितिया अपने शौहर को चिट्ठी लिखने जा रही हैं.... आखिर जैसे तैसे मैनेज करके सितिया ने अपने शौहर को चिट्ठी लिख भेजा... लेकिन ये चिट्ठी उसके ससुराल में पोस्टमैन के लिए गले की फांस बन गई... क्योंकि उसपर जो पता लिखा था... वो तो सही था.. लेकिन अपने शौहर का नाम लिखने में परम्परा ने ऐसी टांग अड़ा दी थी... कि डाकिया बेचारा मारा मारा फिर रहा था... और किसी को कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा था कि आखिर वो इस समस्या का हल कैसे निकाले... गांव के नौजवानों के समझ के परे था... लेकिन एक दिन बेचारा डाकिया गांव के चौपाल के नजदीक से जब गुजर रहा था... तो गांव के बुजुर्गों ने पूछ लिया... कि भई तुम्हारे चेहरे पर किस बात की परेशानी दिख रही है... डाकिए ने जो समस्या बताई... उसपर बुजुर्गों को हंसे बिना नहीं रहा गया... उन्होंने तत्काल डाकिए की समस्या सुलझा दी... दरअसल... चिट्ठी पर सितिया ने अपने शौहर का नाम तो लिख रखा था... लेकिन ग्रामीण परम्पराओं और संस्कारों के तहत महिलाएं अपने पति का नाम जुबान पर नहीं लाती हैं... और न तो लिखती ही हैं... लिहाजा खत पर उन्होंने नाम लिखने की बजाय सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल किया... उस महिला ने लिफाफे के ऊपर नाम की जगह.... एक छेद बनाया... और उस छेद के चारों तरफ गोल आकार में लाल इंक से घेरा बना दिया... बस हो गया छेदीलाल.... लेकिन लिफाफे पर छेद और लाल की कूट भाषा में बना ये सांकेतिक छेदीलाल.... गांव वालों के साथ साथ डाकिए को भी पूरी नाच नचा दिया... इस तरह से सितिया की भेजी चिट्ठी छेदीलाल तक पहुंच गई.... लेकिन छेद और लाल का रहस्य समझने के बाद नए जमाने का बेचारा डाकिया भौंचक था... क्योंकि डाकिया तो कई बार छेदीलाल से भी इसबारे में पूछताछ कर चुका था... डाकिए को भौंचक देख... बुजुर्गों ने कहा... डाक बाबू ! ‘घूंघट’, ‘पल्लू’ और ‘ऐजी सुनिए न’........ इन सारे शब्दों के फेर में ही तो दुनिया चल रही है... नहीं तो ससुरी इस संसार में रखा क्या है.... एक जोरदार कोरस ठहाके के बीच चौपाल खत्म हो जाती है... डाकिया सिर खुजाता इस उधेड़बुन में अपने घर की तरफ चल पड़ता है... कि कहीं दूसरा छेदीलाल....! नहीं... नहीं... इतना ही काफी है....

नोट - सविनय निवेदन है कि मेरे न्यूअर और ओल्डर पोस्ट पर अपना महत्वपूर्ण कमेंट्स भेजकर मेरा उत्साहवर्धन करें... धन्यवाद...

समोसे वाला ब्लू लाइन

ब्लू लाइऩ शब्द सुनते ही दिल्ली, दिल्ली की बस सेवा और उसके कंडक्टर-ड्राइवर की सारी तस्वीरें एक झटके में सामने आ जाती हैं... जिन लोगों ने दिल्ली में थोड़ा वक्त भी गुजारा है...उऩ्हें अच्छी तरह से ब्लू लाइन का मतलब पता है... कंडक्टर और ड्राइवर मतलब... बेअदब, बिगड़ैल, बेमुरव्वत, बदतमीज.... और न जाने क्या-क्या लफ्ज इनके बारे में बेधड़क निकल जाते हैं... लेकिन जब ये मुसाफिरों को समोसे खिलाने की बात करें... तो सुनकर काफी हैरानी हो सकती है... है भी ये अचंभे की बात... चलिए बता ही दूं इनकी कहानी.. हुआ यूं कि.. एक दिन मैं और मेरा एक साथी राजीव.... अपने घर लक्ष्मीनगर लौट रहा था... तब हम दोनों ही दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र हुआ करते थे... और डीटीसी के मंथली कॉन्सेसन पास का भरपूर फायदा...सॉरी...आनंद उठाते थे... फ्री में दिल्ली और नोएडा भ्रमण का शौक पूरा होना छात्र जीवन की बड़ी उपलब्धियां मानी जाती थीं... मैं और राजीव भी दस से बाहर नहीं थे... लेकिन दिल्ली की सरकार बदलते ही हमारी उपलब्धियों में कई और चांद जड़ गए... डीटीसी के पासेस अब ब्लू लाइन में भी मान्य कर दिए गए... यानी लॉटरी निकलने के बाद अगर पता चले कि इनाम में मिलने वाला रैनसम रुपए में नहीं... बल्कि डॉलर में मिलेंगे... तो नाचे मन मोरा.... वाली स्थिति हो जाना लाजिमी है... कमोबेश यही स्थिति पासधारक छात्रों की भी थी... लेकिन अक्खड़ मिजाज ब्लू लाइन संचालक भला इसे कब मानने लगे... फिर क्या था... आए दिन ब्लू लाइन पासधारकों और कंडक्टर के बीच तू-तू मैं-मैं की कहानी आम बात हो गई... लेकिन ब्लू लाइन वालों को अगर डर था... तो एक पुलिस से... दूसरे छात्रों से.... शातिर बस कंडक्टर छात्रों से पंगा तो नहीं लेता... लेकिन वो बस स्टॉप पर छात्रों की भीड़ देखते ही बस भगा ले जाता... रोक कर सवारी चढ़ाने का कोई सवाल ही नहीं था... लेकिन छात्र भी निकले बीस... तू डाल डाल तो मैं पात पात की नीति अपना ली.... छात्र ऐसे में अब अक्सर बस स्टॉप पर खड़े न होकर.... उससे आगे जाकर खड़े होने लगे... साथ ही इस अंदाज में ब्लू लाइन को रोकने का इशारा करते.... जैसे लगता कि ये आम मुसाफिर हैं... छात्र होने का शक इन ड्राइवरों को जार भी न हो... इसका पूरा ध्यान रखते थे....
मैं और राजीव भी एक दिन आईटीओ में ब्लू लाइऩ पर सवार होने के लिए.... छात्रों के बीच मशहूर हो चुके ऐसी ही टेक्निक का इस्तेमाल किया.... आईटीओ के बस स्टॉप से आगे जाकर रेड लाइट से पहले हम दोनों खड़े हो गए... उम्मीद के मुताबिक हाथ देते ही ब्लू लाइन बस रुक गई.... दिक्कत की बात ये थी कि बस में इक्के-दुक्के सवारी ही मौजूद थे... और कंडक्टर हर किसी से पैसे लेने के मूड में था... ऐसे में कंडक्टर बड़ी आस से टिकट निकालते हुए कहा कि हां भई कहां का टिकट दूं... मेरे दोस्त ने छूटते ही कहा... पास.... कुढ़ा-चिढ़ा कंडक्टर भी तपाक से बोल पड़ा... समोसे लाऊं सर... गरमागरम चाय के साथ... आस पास बैठी सवारियां कंडक्टर के इस जुमले पर जोर से हंस पड़े... हंसी तो हम दोनों को भी काफी आ रही थी... लेकिन कंडक्टर की इस अनचाही और अनायास प्रतिक्रिया पर हम दोनों हैरान और अवाक थे... लेकिन हम ठहरे छात्र... वो भी बिहार से आए किसी ऐरे-गैरे गांव के... सवारियां चढ़ती-उतरती रहीं... हम अपने गंतव्य तक पहुंचने का इंतजार करते रहे.... इस बीच कनखियों में कंडक्टर हमें... और हम कंडक्टर को देखते रहे... घूरते रहे... वैसे टक्कर तो नहीं हुई... लेकिन टक्कर की आशंका दोनों तरफ से थी... उसे छात्र ग्रंथि का डर था॥ तो हमें बिगडैल जाट का भय... लक्ष्मीनगर बस स्टॉप आते ही हम दोनों विनम्र छात्र से कब शेर दिल छात्र में बदल गए... पता ही नहीं चला... कंडक्टर भी लड़कियों की तरह आंखों की भाषा समझने में माहिर था... चुप रहना ही ठीक समझा... लेकिन जाते जाते मेरे दोस्त ने जबावी जुमला ठोक ही दिया... हां भई कंडक्टर... तेरे ऑफर का क्या हुआ... समोसे और चाय नहीं लाए... वैसे बता दूं॥ मैं कॉपी पीता हूं... और यहां ज्यादा बोले... तो तेरा खून भी पीऊंगा... मुझे ये समझते देर नहीं लगी... कि वाकई हम शेर(जानवर) बन गए थे... दिल से ही नहीं... व्यवहार से भी... क्योंकि ये सारा माजरा सिर्फ तीन रुपए के टिकट से शुरू हुआ था... कानूनी तौर पर हम गलत नहीं थे... तो पापी पेट के लिए वो भी गलत नहीं था... समझदारी आने में कभी कभी काफी लंबा वक्त लग जाता है... शायद देर आए दुरुस्त आए... चलता हूं...

नोट - आप मेरे न्यूअर और ओल्डर पोस्ट पर भी अपने महत्वपूर्ण कमेंट्स भेजकर मेरा उत्साहवर्धन करें.... धन्यवाद...

‘कछुआ नहीं खाए, कुत्ता तो खा लीजिए...’

हैरानी हो रही होगी आपको... मुझे भी हुई थी.. ऐसे लफ्ज पर लोग अक्सर अपना आपा खो सकते हैं... लेकिन यकीन जानिए.. इसकी सच्चाई जानने पर मैं शर्म से गड़ गया था... और फिर हंसी रुके नहीं रुकेगी... क्योंकि यूपी का बुंदेलखंड ऐसी ही अजीबो-गरीब कहानियों की लड़ी है... बात उस वक्त की है.. जब बुंदेलखंड के बीहड़ में दस्यु सरगना निर्भय गुर्जर का आतंक दम तोड़ने लगा था... और पुलिस से छिपने के लिए निर्भय के लिए बीहड़ भी कम पड़ गए थे... खबरिया चैनल के रिपोर्टर के नाते मुझे निर्भय गुर्जर का इंटरव्यू करना था... लेकिन निर्भय तक पहुंचने के लिए खुद को पहले ‘निर्भय’ बनाना वक्त की मांग थी... ऐसे में विश्वसनीय बिचौलिए की मदद लेनी पड़ी... निर्भय तक पहुंचना कोई खेल नहीं था... कानपुर से औरैया गया... फिर इटावा का रुख किया... मेरे बिचौलिये को दस्यु सरगना के लोगों से बात हो गई थी... निर्भय के ठिकानों का पीछा करते करते मुझे उस दौरान दो-चार गांवों में ठहरने का मौका मिला... ऐसे में अक्सर मैं झूठी कहानियां गढ़कर ग्राम प्रधान के यहां ठहर जाते थे... निर्भय गुर्जर से इंटरव्यू लेने से पहले जो रात मैंने बीहड़ के एक गांव में बिताई थी... वो रात हमेशा के लिए यादगार बन गई... ग्राम प्रधान का नाम दिलावर यादव था... 60 से ऊपर की उम्र थी उनकी... लेकिन अभी भी हट्टा-कट्ठा और लंबे-चौड़े कद काठी का दिलावर यादव बातचीत में काफी सरल थे... सेवा सत्कार में कोई कमी नहीं की... हम उनके लिए अतिथि थे.. कैमरा, गन माइक और ट्राईपॉड उनके हिसाब से हमारी टीम का प्रभाव बढ़ा रहा था... दूसरे दिन सुबह निर्भय गुर्जर से इंटरव्यू होना तय हो गया था... रात में जल्दी खाना खाकर सोना था... खाना खाने बैठा...तो दिलावर यादव खुद पूछ-पूछकर खिला रहे थे... इस इलाके में मुझे जगह जगह भाषाई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था... दिलावर यादव के यहां भी ठेठ बुंदेलखंडी मेरे सिर से ऊपर जा रही थी... खाने के दौरान दिलावर यादव ने मुझे और रोटियों के लिए पूछा.. मैं अपने साथ आए साथियों के सहारे इशारे से काम चला रहा था... पेट भर जाने पर दूसरी बार मैंने रोटियां लेने से मना कर दिया... लेकिन इसपर दिलावर यादव ने कहा... कछुओ ना खायो... कुतो खाए लो.... मैं अजीब उधेड़बुन में पड़ गया... मेरे चेहरे का रंग फक देख मेरे साथियों ने कहा... क्या हुआ... मैंने फौरन उससे कहा... दिलावर जी को क्या हो गया है... वो मुझे कह रहे हैं कि कछुआ नहीं खाए.. कुत्ता भी तो खा लीजिए.... इसपर मेरे साथी ने जोरदार ठहाका लगाया... फिर जल्दी ही मेरी गलतफहमी दूर कर दी... दरअसल... दिलावर यादव जी के कहने का आशय था... कि कुछ भी तो नहीं खाए... कुछ तो खा लीजिए... लेकिन मैंने समझ लिया... कि कछुआ नहीं खाए... कुत्ता भी तो खा लीजिए... फिर क्या था.. बीहड़ में भी मेहमान और मेजबान सभी एकसाथ हंस पड़े...
.... मुझे दस्यु सरगना निर्भय गुर्जर की सच्चाई, उसकी बगावत और उसके आतंक से बड़ी खबर मिल गई थी... ये खबर टीवी चैनल की नहीं... दिल के चैनल की थी... निर्भय मारा गया... लेकिन मेरी वो यादें जिंदा है...

नोट - इस पोस्ट के अलावा मेरा न्यूअर और ओल्डर पोस्ट पर भी अपने महत्वपूर्ण कमेंट्स देकर मेरा उत्साहवर्धन करें.... धन्यवाद...